एक रास्ता था,
कल खत्म हो गया.
पर मंजिल नहीं आई,
मैंने अपने कमरे की मध्धम रौशनी
में मन से कहा.
सारे रास्ते मंजिलों को नहीं जाते,
हाँ, क्षितिज तक सब पहुंचा देते हैं.
वहां से नए रास्ते बनते हैं,
तुम इन्द्रधनुष का रास्ता चुन लेना,
सात रंग सा रास्ता होगा,
सात रंग के लोग मिलेंगे,
एक रंग में तुम रंग जाना.
इसी रास्ते में आसमान मिलेगा,
हवाईजहाज़ और पक्षी मिलेंगे,
जी में आया तो दोस्ती कर लेना.
फिर एक दिन उस आसमान का आसमान दिखेगा,
और नीचे की धरती…
फिर जैसे-जैसे आगे बढ़ोगी,
इन्द्रधनुष धरती की ओर झुकता नज़र आएगा,
तुम्हे एक नए क्षितिज तक ले जाएगा,
जब तुम नीचे आओगी,
धूप तेज़ हो जाएगी,
इन्द्रधनुष को नीलाआसमान निगल जाएगा,
तुम्हारा रंग झड जाएगा,
और पीछे बचेगा बस नीला सा आसमान,
एक दूसरे आसमान के नीचे,
और दोनों ही बेमतलब लगेंगे,
उसी रास्ते की तरह,
जो कल ख़त्म हुआ है.
मनवा बोला और अँधेरा सा हो गया.
मैं अँधेरे में खुद को सुनने की कोशिश करने लगी,
पर बस अपनी ख़ामोशी ही सुन पाई.