मनवा… XII

एक रास्ता था,
कल खत्म हो गया.
पर मंजिल नहीं आई,
मैंने अपने कमरे की मध्धम रौशनी
में मन से कहा.

सारे रास्ते मंजिलों को नहीं जाते,
हाँ, क्षितिज तक सब पहुंचा देते हैं.

वहां से नए रास्ते बनते हैं,
तुम इन्द्रधनुष का रास्ता चुन लेना,
सात रंग सा रास्ता होगा,
सात रंग के लोग मिलेंगे,
एक रंग में तुम रंग जाना.
इसी रास्ते में आसमान मिलेगा,
हवाईजहाज़ और पक्षी मिलेंगे,
जी में आया तो दोस्ती कर लेना.
फिर एक दिन उस आसमान का आसमान दिखेगा,
और नीचे की धरती…
फिर जैसे-जैसे आगे बढ़ोगी,
इन्द्रधनुष धरती की ओर झुकता नज़र आएगा,
तुम्हे एक नए क्षितिज तक ले जाएगा,
जब तुम नीचे आओगी,
धूप तेज़ हो जाएगी,
इन्द्रधनुष को नीलाआसमान निगल जाएगा,
तुम्हारा रंग झड जाएगा,
और पीछे बचेगा बस नीला सा आसमान,
एक दूसरे आसमान के नीचे,
और दोनों ही बेमतलब लगेंगे,
उसी रास्ते की तरह,
जो कल ख़त्म हुआ है.
मनवा बोला और अँधेरा सा हो गया.

मैं अँधेरे में खुद को सुनने की कोशिश करने लगी,
पर बस अपनी ख़ामोशी ही सुन पाई.
 

मनवा… XI

अच्छा तो ये सोचा है तुमने?

इसका मतलब… भागना बंद कर रही हो?

दौड़ ख़त्म तो नहीं हुई अब तक?

थक गई हो?

हार गई हो?

या फिर डर गई हो?

झूठ मत बोलना मुझसे,

मुंह फेर के क्यूँ बैठी हो?

किससे छुप रही हो?

कब तक बैठी रहोगी?

पैरों में दर्द है?

या आँखों की रौशनी कम पड़ रही है?

चुप क्यूँ हो?

बताओ भी!

मनवा पूछता रहा, मैं सुनती रही।

मनवा… X

सामने इंडिया गेट आभामय हो चला था
अभी अभी सुहानी शाम ने रात की चादर ओढ़ी थी
हरी घास भूरी सी दिख रही थी
मैंने हाथ लगाया तो ओस ने मुझको गुदगुदा दिया
मैं धीमे से मुस्काई
और घास से खेलने लगी
मनवा मेरे दोस्तों क़ी हंसी में मेरी तस्वीर देख
भावविभोर था.
मैं खोई सी थी रात के आकाश तले
ना तारे थे ना चाँद ही दिख रहा था
अँधेरा फिर भी रौशन था
अपनी सी मुस्कुराहटों के बीच.
पगली हवा लुका छुपी खेल रही थी,
कभी मुझसे मेरे मनवा को छू लेती
और फिर बातों में गुम हो जाती!
निशा को अंत मंज़ूर नहीं था,
रात फिर भी गहराती जा रही थी
स्लेट सी सड़क पर अदृश्य पद चिन्ह बनाते हुए
हम चारो चल पड़े यूँ ही मानो रास्ता कभी ख़तम ना होगा.
फिर मनवा मेरी तरफ देख कर बोला
ऐसी मुस्कुराहट देखी थी कभी तुमने?
मैंने दोस्तों की तरफ देखा
और सोच में पड़ गई!
मनवा हंस कर बोल पड़ा
खुद के आईने में ज़रा देखना
मुझको पाओगी इसी हसीन पल में
यहीं गगनचुम्बी इंडिया गेट के तल में
जब अँधेरी रात ऐसे ही रौशन होगी.
मैंने कहा
इक खूबसूरत पल
अब यादों में बस गया
तुम संजो लेना.

मनवा… IX

अरे यूँ तो तुम जल जाओगी!
मनवा बोल पड़ा
जब मैं धूप में खुद को झुलसा रही थी.
मैंने कहा
मेरा मिट्टी का शरीर
तीव्र ताप को सहने के लिए बना है.
कभी कुंदन को देखा है?
वैसी ही हूँ मैं.
तुम्हें धूप छू नहीं सकती,
जब तक मैं धूप नहीं बन जाऊं.
पर इस क्षण की अस्मिता में चांदनी बन रहीं हूँ,
पता है, कैसी चांदनी?
मिट्टी सी चांदनी
कुंदन की चमक
और असंख्य कविताएँ
शंखों की माला में गूथीं हुईं
गाँधी घाट की पावनी के किनारे की रेत
पर गिरी रहूँ
और मटमैली हो जाऊं
फिर बरखा अपनी पैनी नज़र की
बिजली मुझपे गिरा दे
बोलो कैसा मंज़र होगा,
भला मुझसे सुन्दर कौन होगा तब?
और तुम कहते हो मैं जल जाउंगी!

एक टक सा मुझको निहार कर
मनवा प्यार से बोला
फिर से बावरी हो चली हो तुम,
मैं कैसे रोक लूं तुम्हें?
मैं हंस पड़ी.
गोलघर के सामने वाली सड़क मेरे घर को जाती है
मैंने कहा चलो
आज मेरे घर चलते हैं
कैसा है तुम्हारा घर?
पत्तों की छोटी सी इमारत है
जिसमें मैं और तुम चैन से रह सकते हैं
कुछ कीड़े और गोजर भी इधर उधर घूमते रहते हैं,
मुझे हरे रंग के कीड़े पसंद हैं.
जब आसमान गिरा था तो मैंने उसकी छत बना ली थी
बस बरसात में टपकती है,
मुझे काले बादलों का शोर पसंद है.
गर्मियों की रातें सुहानी होती हैं,
सारे सितारे एक साथ टिमटिमाते नज़र आते हैं,
सर्दियों में सुबह की धूप
सबसे पहले मेरे घर पर दस्तक देती है.
मेरी एक दोस्त भी है; आंधी.
जब जब आंधी आती है,
मेरा घर टूट जाता है,
आंधी और मेरी ऐसी ही दोस्ती है
वो एक क्षण में तोडती है,
मैं सालों में जोडती हूँ.
अपना घर.

 

चलोगे? मेरे साथ?
मनवा हंस कर मेरे साथ चल पड़ा.

मनवा… VIII

आज थोड़ी व्यथा सुन लो,
चंचला आज ठहर कर
मेरी कहानी बर्दाश्त कर लो.
मनवा कहने लगा
जब मैं काली रात के साए में
सफ़ेद मोम के विशाल
शिलाखंड पर
अलसाई लौ सी जल रही थी.
मैंने कुछ कहा नहीं
क्या कहती?
जब सारे प्रश्नों का उत्तर
थी, मैं. बस मैं.
सुन तो लो
मनवा फिर से कहने लगा
मेरी बातों से क्यूँ मुंह फेरती हो?
क्यूँ मुझसे इतना डरती हो?
खुद को दर्पण में देख कर
यूँ तो रोज़ मोहित होती हो
मेरा दर्पण क्यूँ नहीं देखना चाहती?
मैंने कहा
मैं सोना चाहती हूँ
आँखे बंद करके शशि किरण
को छूना चाहती हूँ,
तुम चार बदल ले आना
तकिया बना लूंगी
और इसी मोम को पिघला कर
ओढ़ लूंगी.
फिर सुबह हो जाएगी
मोम पिघल जाएगा ताप से
मैं गिर जाउंगी फिर से
तब जो चोट लगेगी
उसका दर्द कैसा होगा?
पहले जैसा होगा?
मनवा मौन रह गया.